मंगलवार, 26 मई 2015

मुझे ऐसा लगा .....! (कविता)

मुझे ऐसा लगा आपका चेहरा उदास है
कहाँ खोये रहती हैं लगाईं क्या आश हैं
जब मैं चला अपने आशियाना की तरफ,
ऐसा लगा रोकने का कर रही प्रयास हैं।
आँखों में देखा भरा आँसुओं का शैलाब है
उमड़ रहा था जैसे बादल भरा बरसात है
स्पष्टतः हृदय  की आवाज़ झलक रही थी,
कह रही  रुक जाइए करनी कुछ बात है।
मौन की ही भाषा में चल रही कुछ बात है
अन्तरात्मा की आवाज़ उठा रहीं सवाल है 
जाकर क्या करेगें ? ठहरिए कुछ देर तक,
बाकि है दिल की तमन्ना पूर्ण  की आश है।
--------रमेश कुमार सिंह ♌
-------१८-०४-२०१५

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