मंगलवार, 14 अप्रैल 2015

पैसा -पैसा(कविता)

कोई दिवास्वप्न देखता है,
कोई ख्वाबोंको सजाता है।
यही पैसे की बेचैनी,
जो सबको भगाता है।


जो कीमत इसकी समझता है
ये उसके पास नहीं रहता।
जो कीमत नहीं समझता है,
हमेशा उसके पास रहता है।


जिसको कमी महसूस होता है,
इसका दर्द वही समझता है।
जिसके दिल पर गुजरता है,
बयाँ वही कर पाता है।


पैसा -पैसा होड़ मचा है ,
पैसा कहाँ है शोर मचा है।
इसी के खातीर लोभ बढा है,
एक दूसरे में द्वेष बढा है।


आऔ मिलकर करें कुछ ऐसा,
आ जाये सब में मानवता।
मानवता को सब अपनाकर,
व्यवहार करें सहयोग जैसा।
------रमेश कुमार सिंह ♌

6 टिप्‍पणियां:

  1. सबकी जड़ में पैसा है ..
    बढ़िया रचना

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  2. पैसा अच्छा नौकर है करता है हर काम पूरा
    पर हर कर्म करवानेवाला स्वामि है सबसे बूरा

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  3. आज पैसा इतनी गहरी जड़ बना चूका है की इसको उखाड़ना आसान नहीं ...अच्छी रचना है ...

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